Saturday, October 17, 2020

Akbar Birbal stories in hindi with moral

 In this post, I have written Akbar Birbal stories in Hindi which you should read and tell your kids.


akbar birbal stories in hindi
Akbar Birbal Stories in Hindi


    घर कैसे लुटा | Akbar birbal stories in hindi


    शहंशाह अकबर एक रोज दरबार में आए तो वह सबको बहुत ही गमगीन मुद्रा में दिखे । दरबारियों ने उनसे इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा , " अब यह बेचैनी और उदासी तो बीरबल ही दूर कर सकते हैं । " इसी बीच बीरबल दरबार में आ गए । जहांपनाह ने बीरबल को गौर से देखा और कहा , " बीरबल , शायद तुम मेरी समस्या सुलझा सको । इस प्रश्न में पूरे राज्य की समस्या छुपी हुई है । बताओ , घर कैसे लुटा और बैल कैसे घायल हुआ ? " बीरबल के लिए कोई भी सवाल कठिन नहीं होता था ।


    वह शीश नवाकर बड़े अदब से बोले " जहांपनाह , जुआ नहीं हटा था । " " तम कहना क्या चाहते हो , बीरबल , साफ - साफ बताओ । " अकबर ने कहा । " जहांपनाह , जुआ खेलना नहीं रोका गया तो घर लुट गया और बैल की गरदन से जुआ नहीं हटाया गया तो बैल घायल हो गया । " बीरबल ने स्पष्ट शब्दों में जवाब दिया । शहंशाह अकबर बहुत ही खुश हुए और उसी समय उन्होंने घोषणा कर दी कि हमारे राज्य में कोई भी जुआ नहीं खेलेगा , जो जुआ खेलते पकड़ा जाएगा उसे दंडित किया जाएगा । इससे पूरे राज्य में अमन चैन स्थापित करने में बादशाह को काफी सहायता मिली ।


    अपनी दाढ़ी की आग बुझाऊंगा | Akbar birbal stories in hindi


    बादशाह अकबर के दिमाग में तरह-तरह की बातें आती रहती थीं। दरबार में वह बैठे हुए थे और वरबारियों से बातें करने में मशगूल थे। तभी अचानक उन्होंने दरबारियों से सवाल कर दिया, "खुदा न करे अगर सबकी दाढ़ी में आग लग जाए और उसमें मैं भी शामिल होऊं तो आप सब सबसे पहले किसकी दाढ़ी की आग बुझाना चाहेंगे?" दरबारियों में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया, फिर अधिकांश दरबारियों ने समवेत स्वर में कहा, "जहांपनाह की दाढ़ी की।" शहंशाह को दरबारियों की बात पर यकीन नहीं हुआ। उन्होंने बीरबल की ओर देखा। वह खामोश बेठे हुए थे।


    शहंशाह ने बीरबल से पूछा, "बताओ बीरवल, किसकी दाढ़ी की आग पहले बुझाओगे?" बीरवल बोले, "जहांपनाह, सच्चाई तो यही है कि मैं पहले अपनी दाढ़ी की आग बुझाऊंगा, फिर दूसरे की दाढ़ी के बारे में सोचुंगा।" बीरबल ने आत्मविश्वास से कहा। बादशाह अकबर ने बीरवल को गर्व से देखा और कहा, "बीरबल तुम एक हाजिरजवाब ही नहीं, बल्कि एक सच्चे व्यक्ति भी हो। बाकी लोग मुटझे खुश करने के लिए झूठ बोल गहे थे. जबकि हर व्यक्ति पहले अपने बारे में ही सोचता है। हम तुम्हारे इस जवाब से बहुत खुश है, बीरबल।" यह कहकर शहंशाह चुप हो गए। वह बीरवल की स्पष्टवादिता मे बहुत ही खुश थे।


    -> akbar birbal ki kahani


    नदी पति के घर जा रही है | Akbar birbal stories in hindi


    वर्षा ऋ्तु थी। यमुना नदी में बाढ़ आई थी। लहरें किनारे पर आकर टकरा रही थीं, जिससे अजीब सी 'छप-छप' की आवाज होती थी। शहंशाह अकबर का महल यमुना तट पर ही था। बादशाह गहरी नींद में सोए हुए थे। रात का सन्नाटा चारों तरफ फैला पड़ा था। छप-छप की आवाज जब बादशाह के कानों में पड़ी तो वह जाग गए और छप-छप की आवाज सुनने लगे। फिर इसके बाद बादशाह को नींद नहीं आई तो वह कमरे में ही उठकर टहलने लगे। टहलते-टहलते वह खिड़की के पास आ गए और पानी से लबालब भरी यमुना नदी को अपलक देखने लगे। लहरों की छप-छपाहट अभी भी उनके कानों में गूंज रही थी। तभी उन्हें ऐसा जान पड़ा जैसे नदी रो रही हो।


    शहंशाह के मन में सवाल उठ खड़ा हुआ कि आखिर क्या बात है। रात के सन्नाटे में सब सो रहे हैं मगर नदी क्यों रो रही है? अपने इस प्रश्न का जवाब वह नहीं ढूंढ़ सके तो बिस्तर पर आकर चुपचाप लेट गए। दूसरे दिन शहंशाह दरबार में आए तो सभी दरबारियों से यही प्रश्न किया कि नदी रोती क्यों है? बारी-बारी से सभी दरबारियों ने अपनी समझ के अनुसार जवाब दिया लेकिन किसी के भी जवाब से बादशाह को संतुष्टि नहीं मिली। इसी बीच बीरबल दरबार में पधारे।" बादशाह ने बीरबल को देखते ही सवाल कर दिया, "बताओ बीरबल, नदी क्यों रोती है?"


    बीरबल इस बेतुके सवाल पर कुछ देर तक हतप्रभ खड़े रहे फिर उन्होंने कहा, "जहांपनाह, मैं आपके सवाल का जवाब तभी दे सकता हूं जब मैं नदी का रोना अपने कानों से सुनूंगा।' "बीरबल, नदी के रोने की आवाज तो मैं तुम्हें रात के सन्नाटे में ही सुना सकता हूँ।" बादशाह ने यह कहकर बीरबल को देखा। बीरबल रात होने पर शहंशाह के महल में पहुंचे। बादशाह उन्हें अपने महल की खिड़की के पास ले गए और वह छप-छप' की आवाज उन्हें सुनाई और इसका कारण पूछा। बीरबल अगले पल ही यह समझ गए कि यह तो पानी के बहने की आवाज है और वादशाह ने इसे ही नदी का रोना मान लिया है। बीरबल झुककर बड़े ही विनम्र स्वर में बोले, "हुजूर, नदी अपने पिता के घर यान पहाड़ से विदा होकर अपने पति यानी समुद्र के यहां जा रही है, जिससे वह पिता से अलग होने के गम में रोती जा रही है।' बीरबल का जवाब इतना सटीक और हकीकत भरा था कि बादशाह अकबर खुशी के मारे गद्गद हो गए और कहा, "बीरबल, तुम्हारे पास तो हर सवाल का जवाब होता है। हम तुम्हारे जवाब से संतुष्ट हुए।"


    बादशाह के अनमोल सवाल | Akbar birbal stories in hindi


    आज दरबार समय से पहले ही लग गया था। बादशाह अकबर समय से पहले ही दरबार में आकर बैठ गए थे। शहंशाह अकबर की यह खासियत थी, जब वह फुर्सत में होते थे, तब तरह-तरह के विचार उनके मन में उत्पन्न हो जाया करते थे और फिर वह दरबारियों से उनका समाधान पूछते थे। बीरबल आज दरबार में नहीं थे। शहंशाह ने दरबारियों से पूछा, "दूध किसका अच्छा, फूल किसका अच्छा, पत्ता किसका अच्छा, राजा कौन अच्छा और मिठाई किसकी अच्छी?"


    शहंशाह के सवाल सुनते ही दरबारी आपस में फुसफुसाने लगे। किसी दरबारी ने गाय के दूध को अच्छा बताया तो किसी दरबारी ने भैंस का और किसी ने बकरी का दूध अच्छा बताया। इसी तरह से किसी दरबारी ने गुलाब का फूल अच्छा बताया तो किसी दरबारी ने कमल का। किसी दरबारी ने केले के पत्ते को अच्छा बताया तो किसी दरबारी ने नीम के पत्ते को अच्छा बताया। किसी दरबारी ने राजा कौन अच्छा के  जवाब में शहंशाह को अच्छा बताया और अंतिम सवाल के जवाब में किसी दरबारी ने गन्ना को अच्छा बताया तो किसी दरबारी ने अंगुर को और किसी दरबारी ने मिष्ठान को अच्छा बताया, लेकिन बादशाह अकबर उनके जवाब संतुष्ट नहीं हुए।


    तभी दरबार में बीरबल आ गए। बादशाह के चेहरे पर उनको देखते ही चमक आ गई और बीरबल के बैठने से पहले ही शहंशाह ने उपरोक्त पांचों सवालों के जवाब पूछे। बीरबल कुछ पल तक शांत रहे, फिर बोले, "जहांपनाह, मां का दूध सबसे अच्छा और हितकारी होता है। कपास का फल सबसे अच्छा होता है, क्योंकि इससे सबके शरीर ढक जाते हैं। पान का पत्ता सबसे अच्छा होता है, क्योंकि इसे खाकर दुश्मन भी दोस्त बन जाते हैं। राजाओं में इन्द्र सबसे अच्छे हैं , क्योंकि उनके आदेश से बारिश होती है और वारिश से धन-धान्य में वृद्धि होती है और पूरे प्राणियों की क्षुधा तृप्त होती है। मिठास वाणी की सबसे अच्छी होती है, क्योंकि जिसकी वाणी में मिठास होती है, वह सारे जगत को अपने वश में कर लेता है।" शहंशाह ने सिंहासन से उठकर बीरबल को गले से लगा लिया और कहा, "बीरबल, तुमने अपने जवाब से मुझे तृप्त कर दिया।


    नीचे की मंजिल | Akbar birbal stories in hindi


    बादशाह अकबर को आकर एक दरबारी ने बताया कि बीरबल अपनी बांदियों और दासियों का ध्यान जरूरत से अधिक रखते हैं, जब देखो उनकी बड़ाई करते रहते हैं। दरबारी की इस बत को सुनकर शहंशाह के मन में विचार आया कि क्यों न हम चलकर स्वयं इस बात की तहकीकात करें कि आखिर मामला क्या है? इसके दूसरे दिन बादशाह अकबर अचानक ही बीरबल के घर पहुंच गए और सीढ़ियां चढ़ते हुए ऊपरी मंजिल पर पहुंच गए।


    बादशाह सलामत को सहसा बीरबल के यहां देखकर एक दासी दौड़ी-दौड़ी आई। बादशाह सलामत दासी को देखकर हल्का-सा मुस्कराए, फिर बोले, "तुम्हारी ऊपर की मंजिल तो बहुत सजी हुई है, सुन्दर और हसीन भी है लेकिन जरा नीचे की भी तो देखें कैसी है?" दासी बीरबल का नमक खाती थी। बीरबल के नमक का कुछ तो असर उस पर था ही। वह अगले पल ही मुस्कराकर बोली, "अवश्य देखें, हजूर! आप उसी रास्ते से तो होते हुए आए हैं, फिर भी आपको मालूम नहीं हुआ कि नीचे की मंजिल कैसी है?'


    सवाल के बदले सवाल, शहंशाह भोंचक्के रह गए। दासी का तीखा, पर सटीक जवाब शहंशाह ने सुना तो उन्हें यह समझने में देर न लगी कि बीरबल की दासियां सचमुच ही तारीफ के काबिल हैं। बीरबल यूंही उनकी तारीफ करते नहीं फिरते है। शहंशाह चुपचाप महल को लौट गए।


    -> Akbar Birbal short stories in Hindi for kids


    विश्वासघाती काजी | Akbar Birbal stories in Hindi


    फातिमा बीबी नाम की एक विधवा महिला ने अपने बाकी दिन गुजारने के विचार से  मक्का-मदीना जाने का निर्णय लिया। उसकी कोई संतान नहीं थी। हज पर जाने से पहले फातिमा बीबी ने अपने सारे गहने बेचकर सोने की मोहरें ले लीं। अपने खर्च के लिए कुछ मोहरें बाहर रखकर बाकी 800 मोहरें एक थैली में बंद कर उसके मुंह पर लाख की मोहर लगा दी। फिर वह अपने घर के ही पास में रहने वाले काजी के घर उस थैली को लेकर पहुंच गई। वह काजी अपनी ईमानदारी और रहमदिली के लिए ही मशहूर था।


    फातिमा बीबी को अपने घर पर देखकर काजी बहुत खुश हुआ और उनसे पूछा, "कहिए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हुं?" फातिमा बीबी बोलीं, "काजी साहब, आप जैसा ईमानदार, शरीफ और सत्यवादी इस पूरे शहर में कोई नहीं है। मैं चाहती हूं कि मेरी यह थैली आप रख लें ताकि मैं निश्ंचित होकर हज करने के लिए मक्का-मदीना जा सक। इस थैली में 800 स्वर्ण मोहरे हैं । आअल्लाह के करम से यदि में सही-सलामत वापस आ गई तो मैं आपसे आकर इनको ले लूगी और यदि में अल्लाह को प्यारी हो गई तो इस थैली के मालिक आप होंगे, फिर आपका जो मन करे इनका कर लेना।'


    फातिमा बीबी के इतना कहने पर काजी बोला, "बीबी साहिबा, आपका जो मन करे मेरे यहां निश्चित होकर रख सकती हैं। आपके लौटने तक मैं आपकी अमानत जान पर खेलकर भी सुरक्षित रखूंगा। आप आराम से हज करने के लिए जाइए।" काजी ने फातिमा बीबी को दिलासा देते हुए कहा तो वह मन-ही-मन काफी प्रसन्न हो गई। फातिमा बीबी भी कोई साधारण महिला नहीं थीं। थैली की प्रत्येक मोहर पर उसने एक छोटा-सा निशान बना दिया था, जो बहुत ध्यान से देखने पर ही नजर आ सकता था। फातिमा बीबी को जब मक्का-मदीना गए. पांच वर्ष हो गए तो काजी को यही लगा कि वह अब लौटकर नहीं आने वाली। वह निश्चित रूप से ही अल्लाह को प्यारी हो गई होगी। ऐसा सोचते ही काजी के मन में पाप जाग गया।


    उसकी नियत खराब हो गई। उसने मन-ही-मन यह फैसला कर लिया कि वह 800 मोहरें अब किसी को भी नहीं देगा। फातिमा बीबी अगर आ भी गई तो उनको भी नहीं। एक रोज फातिमा बीबी अचानक ही मक्का-मदीना से लौट आईं और वह सीधे काजी के पास अपनी थैली मांगने के लिए चली गई। काजी ने उन्हें थैली वापस दे दी। घर पहुंचकर फातिमा बीबी ने थैली का मुंह खोला तो आश्चर्य से उनकी आंखें फटी की फटी रह गईं। थैली में सोने की मोहरों की जगह उतनी ही संख्या में पैसे और रांगे के टुकड़े थे। फातिमा बीबी का चेहरा बुझ गया। वह खुली थैली को लेकर काजी के घर पहुंचीं और कहा, "इसमें तो सोने की मोहरें नहीं हैं।" काजी तेवर बदलते हुए बोला , "एक तो नेकी करो ऊपर से बदनामी भी.. देखो बीबी साहिबा, मैंने तो केवल थैली रखी थी, उसमें सोने की मोहरें हैं या रांगे की यह तो मैंने देखा भी नहीं था। तुम जैसी थैली हे गई थीं, वैसी ही मैंने रख ली थी। जैसी मोहर लगी थैली तुमने दी थी, वैसी ही मोहर लगी थैली मैंने लौटाई भी है।देखिए, आप मुझे बदनाम न करें।" काजी की बातें सुनकर फातिमा वीबी को चक्कर से आ गए। वह गिड़गिडाते हुए बोलीं, "काजी साहब, मुझ पर रहम करो। मैं एक निःसंतान बुढ़ी विधवा हूँ। मेरे आगे-पीछे मुझे देखने वाला कोई नहीं है।


    मुझ बेसहारा औरत पर रहम करो। के मोहरें ही मेरे बुढ़ापे का सहारा हैं । आप सारी मोहरें नहीं देना चाहते हैं तो आधी ही दे दीजिए। मैं तो आपको शहर का सबसे अधिक ईमानदार और रहमदिल इंसान समझकर अपनी थैली सौंप गई थी। आपने तो मुझ बेसहारा वृद्धा के साथ ऐसा विश्वासघात किया कि मैं कहीं की भी न रही।" काजी काफी नाराज हो गया और आगे बढ़ते हुए धमकी भरे स्वर में बोला , *"देखो बीबी, तुम यहां से चुपचाप इज्जत के साथ चली जाओ, नहीं तो धक्के मारकर बाहर कर दूंगा।" विधवा फातिमा बीबी आंसू बहाती हुई काजी के घर से बाहर आ गईं। अब उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें, क्या न करें, कहां जाएं और कहां न जाए? फिर अचानक ही उनकी आंखों के सामने अकबर बादशाह का दरबार नाच गया। वह बदहवास-सी सीधे बादशाह अकबर के दरबार की ओर बढ़ गई। दरबार डरी-सहमी वह दाखिल हुईं और अपनी सारी आपबीती कह सुनाई। बादशाह ने काजी को दरबार में बुलवाया और उससे पूछा, "इस वृद्धा औरत की थैली के विषय में तुम्हें मालूम है?"


    काज़ी हाथ जोड़कर कांपते स्वर में बोला, "जहांपनाह, कोई पांच वर्ष पहले यह बुदढिया मेरे यहां एक थैली छोड़ गई थी। जब यह वापस आई तो मैंने सहर्ष इसकी मोहर लगी थैली इसे वापस दे दी। हुजूर, मुझे नहीं मालूम उस थैली में सोने की मोहरें थीं या रांगे के टुकड़े।" काजी ने बड़ी सफाई से जहांपनाह के सामने झूठ बोला। लेकिन शहंशाह अकबर को काजी की बातों पर श्वास नहीं हुआ। बादशाह काजी को घर जाने को कहा और फातिमा बीबी से कहा, "तुम शाही दरबार में हो। तुम्हें चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें पूरा न्याय मिलेगा। तुम्हारी मोहरें कुछ दिनों में ही तुम्हें मिल जाएंगी।" शहंशाह ने यह हुक्म देकर बीरबल को यह विवाद शहशाह सौंप दिया। यह विवाद बीरबल के हाथ में आते ही उन्होंने फातिमा बीबी से थैली ले ली और उस थैली को अपने घर ले गए। बीरबल ने वैसी ही कुछ थैलियां मंगवाकर उनमें कुछ-न-कुछ भरकर लाख की मोहरें लगवा दीं। फिर उनमें सुराख कर दिए। तत्पश्चात शहर के सभी रफगरों को एक-एक थैली दी और उनसे थैलियों के छेदों को रफ करवाया।


    बीरबल ने सभी थैलियों को बड़ी बारीकी से देखा। एक थैली पर उनकी निगाह अटक गई। इसे बारीकी से देखने पर भी छेद का पता नहीं चल रहा था। बीरबल ने कहा, "इस थैली का रफू किस रफूगर ने किया है।" एक रफूगर चलकर बीरबल के पास आया और बोला, "हुजूर, क्या बात है, मैंने रफू किया है।" बीरबल उस रफूगर को लेकर एकांत में गए और डराते धमकाते हुए उससे पूछा, "बताओ, काजी की थैली रफ किसने की थी? तमने की थी न?" काजी की थैली उसने ही रफू की थी। बीरबल ने उससे पूछा, "सच-सच बोलना। तुमने यह थैली कब रफू की थी। बीरबल ने तल्ख स्वर में पूछा तो रफूगर कांपते स्वर में बोला, "हुजूर, कोई दो साल हुए होंगे, एक काजी ने मुझसे यह थैली रफ करवाई थी।" "क्या तुम्हें पता है उस थैली में क्या रखा हुआ था?" बीरबल ने रफूगर को घूरते हुए पूछा तो रफूगर सच को छिपा न सका और उसके मुंह से निकल गया, “हुजूर उस में कुछ तांबे के पैसे और रांगे के टुकड़े थे।" "काजी ने इस काम के लिए क्या तुम्हें कुछ दिया था?" बीरबल की कड़क आवाज के आगे रफगर बिल्कुल ही ढीला पड़ गया। वह थमती आवाज में बोला, "दो मोहरें मिली थीं, मालिका" "क्या वे मुहरें तुम्हारे पास अभी भी हैं। देखो, सच का साथ दोगे तो मैं तुम कहते ही रफूगर बड़ी मुश्किल से बोला, "हजूर झूठ नहीं बोलूंगा। एक मुहर तो खर्च हो गई है। हां, एक मुहर मेरे पास है।" की कोशिश की तो शाही कहर से तुम्हें मैं भी नहीं बचा सकता।"


    बीरबल के इतना कहते ही रफूगर भागा-भागा मोहर लाने चला गया। बीरबल ने फातिमा बीबी और काजी को भी बुलवा लिया। रफूगर थोड़ी देर के बाद मोहर लेकर बीरबल के पास आया तो काजी उसको देखते ही डर गया। बीरबल ने रफूगर से मोहर लेकर फातिमा बीबी के हाथ में रख दी और कहा, "तुमने अपनी मोहरों पर निशानी लगाई थी ना दिखाओ वह निशानी कहां है।" फातिमा बीबी ने पलक झपकते ही अपना लगाया निशान बीरबल को दिखा दिया। अब बीरबल ने रफूगर की ओर थैली करके कहा, "बोलो रफूगर, यह वही थैली है न?" "हां हुजूर, यह वही थैली है।" रफूगर रुक-रुककर बोला। "हां तो...." बीरबल तल्ख आवाज में बोले, "तुमने कहां पर रफू किया था, बोलो?" रफ़गर थैली र हाथ घरते हुए बोला, "यहां पर हुजूर। मेरा काम साफ नजर आता है।" काजी के तो पसीने छूटने लगे।


    उसके पास ऐसा कोई जवाब ही नहीं था कि वह अपने बचाव में कुछ कह सके। बीरबल गरजकर बोले, "इस काजी को जंजीरों में बांधकर जेल में डाल दिया जाए।" इसके बाद काजी के घर की तलाशी ली गई और फातिमा बीबी की मोहरें उसके घर से बरामद हुई। फातिमा बीबी ने अपना निशान सभी मोहरों पर दिखा दिया। बीरबल ने उन सारी मुहरों को उसे दे दिया। रफगर को ईनाम देकर जाने दिया गया। बादशाह सलामत बीरबल के र फैसले से बहुत खुश हुए।


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