Saturday, January 11, 2020

Akbar Birbal ki Hindi Kahaniya with morals

Akbar Birbal ki Hindi Kahaniya with morals : इस पोस्ट में अकबर बीरबल की दो प्रसिद्द कहानी लिखी हुई है |

akbar birbal ki hindi kahaniya

आराम से जो मरे वो सुखी 

बादशाह अकबर एक दिन बीरबल के साथ सुबह की सैर पर निकले। एक नंगे आदमी को देखकर उन्हें गुस्सा आ गया। उन्होंरे बीरबल से पूछा, "बताओ बीरबल, सबसे अधिक सुखी इस दुनिया में कौन है? मैं तरह तरह की वेशभूषा में लोगों को जीवन बिताते तथा अनेक प्रकार के भगवानों की पूजा/इबादत आदि करते देख कर असमंजस में पड़ गया हूँ।


बीरबल, मुझे मालूम है, मेरे सवाल का जवाब केवल तुम ही दे सकते हो।" बीरबल बोले, "हूजूर, कोई आदमी कितना सुखी है। या कितना दुःखी है, इसका पता तो उसके मरने के बाद ही चल पाता है।" "बीरबल, तुम क्या कहना चाहते हो, हम समझे नहीं।" शहंशाह अकबर ने कहा। बीरबल बोले, "जहांपनाह, आज जो आदमी सुखी है, वही कल को मुसीबत में पड़कर दुखी हो जाता है।


फिर ऐसे में किसी जिंदा व्यक्ति को कैसे सुखी या दुखी कहा जा सकता है। यहां अनगिनत ऐसे आदमी हैं, जो दिखते तो सुखी हैं, पर उनका दिल दु:खों से भरा पड़ा है। फिर उन्हें सुखी कैसे कहा जा सकता है। हुजूर, मेरी राय में तो जो व्यक्ति सुखपूर्वक मरता है, वही सुखी होता है।' बीरबल के इस जवाब को सुनकर शहशाह बहुत प्रसन्न हुए और उनकी तारीफ करने लगे।


Akbar Birbal ki Hindi Kahaniya with morals


लेने के देने पड़े 

एक आदम्री ने नींद में सपना देखा कि उसने अपने दोस्त हरिराम से सौ रुपये उधार लिए हैं । सुबह जब वह बिस्तर से उठा तो उसने स्वप्न के बारे में अपने दोस्तों को बताया। इस तरह यह बात चारों तरफ फैल गई कि घनश्याम ने हरिराम से सौ रुपये उधार लिये हैं। हरिराम को जब यह बात मालूम हुई तो वह घनश्याम के पास पहुंचकर बोला, "मैंने तुम्हें जो सौ रुपये दिए थे, मुझे वापस कर दो।"

घनश्याम आश्चर्य से बोला , "यह तुम क्या कह रहे हो? वह तो स्वप्न की बात थी।" हरिराम बोला , "देखो, इंकार न करो। गवाही सैकड़ों लोग दे सकते हैं। तुमने स्वयं सबसे यह बात कही है। रुपये लेना तुमने खुद स्वीकार किया है।" "दोस्त, वह तो सपने की बात थी। सपने की बात सच थोड़े ही होती है?" घनश्याम ने कहा। हरिराम भौंहें चढ़ाकर बोला , "मैं कुछ नहीं जानता, जब तुमने रुपये लेना स्वीकार कर लिया है तो तुम्हें रुपये देने ही पड़ेंगे।


अगर तुम रुपये नहीं दोगे तो मैं यह मामला बादशाह अकबर के दरबार में ले जाऊंगा। घनश्याम इतना गरीब था कि उसके पास तो कभी सौ रुपये होते ही नहीं थे वह सौ रुपये देता भी तो कैसे देता? वह बहुत ही परेशान हो गया और डर गया। आखिर मामला बादशाह अकबर के दरबार में पहुंचा। बादशाह ने यह मामला बीरबल को सौंपते हुए कहा, "बीरबल, अपनी चतुराई से सही न्याय करो।"

बीरबल ने दोनों पक्षों की पूरी बातें सुनीं। गवाहों की बातें सुनीं। फिर सौ रुपये गिनकर एक थैली में रखे और हरिराम के सामने उस थैली को सरकाते हुए एक आईने के सामने इस तरह से रखी कि थैली का प्रतिबिंब आईने में साफ दिखने लगा। आईने की ओर इशारा करते हुए बीरबल ने ऊंचे स्वर में कहा, "हरीराम, तुम आईने से अपने रुपये ले सकते हो।"

हरिराम आश्चर्य से बोला, "हुजूर, आईने में दिखाई देने वाले रुपये को मैं कैसे ले सकता हूँ? "बिल्कुल सही कहा।" बीरबल बादशाह की ओर देखते हुए बोले, "सपना भी तो एक प्रतिबिंब की तरह ही होता है। फिर सपने में उधार लिया गया रुपया कैसे वापस किया जा सकता है? हरीराम, तुमने झूठा आरोप लगाकर दरबार का समय बर्बाद किया है। अत: तुम पर २० रुपये का जुर्माना किया जाता है ताकि तुम भविष्य में कभी ऐसी गलती न करो। बीरबल के इस न्याय से बादशाह बहुत प्रसन्न हुए। लालची हरिराम को लेने के देने पड़ गए।

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